यह एकाग्रता जितनी अधिक होगी, उतना ही अधिक मनुष्य ज्ञानलाभ करेंगे, कारण, यही ज्ञानलाभ का एकमात्र उपाय है- “नान्यः पन्था विद्यते अयनाय"। अर्थ का उपार्जन हो, चाहे भगवद् आराधना हो - जिस काम में जितनी एकाग्रता होगी, वह कार्य उतने ही अधिक अच्छे प्रकार से सम्पन्न होगा। द्वार के निकट जाकर बुलाने से या खटखटाने से जैसे द्वार खुल जाता है, उसी भाँति केवल इस उपाय से ही प्रकृति के भण्डार का द्वार खुलकर प्रकाश बाढ़ रूप में बाहर आता है।
मन की शक्तियों को एकाग्र करने के सिवा अन्य किस तरह संसार में ये समस्त ज्ञान उपलब्ध हुए हैं? यदि प्रकृति के द्वार पर आघात करना मालूम हो गया - उस पर कैसे धक्का देना चाहिए, यह ज्ञात हो गया, तो बस प्रकृति अपना सारा रहस्य खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता एकाग्रता से ही आती है। मानव मन की शक्ति की कोई सीमा नहीं। वह जितना ही एकाग्र होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर आती है; बस यही रहस्य है।
मानवजाति के इतिहास में विश्व के कल्याण के लिए जो अवतार हुए हैं, उनका जीवनव्रत प्रारम्भ से ही निश्चित रहा है। अपने जीवन का सारा नक्शा, सारी योजना उनकी आँखों के सामने थी, और उनसे वे एक इंच भर भी न डिगे। इसका कारण यह है कि वे अपने जीवन में विश्व के लिए एक सन्देश लेकर आये थे। ... जब वे बोलते हैं, तो एक एक शब्द सीधे हृदय में प्रवेश करता है और सुननेवाले पर अपना असीम प्रभाव जमा लेता है। निरी वाणी में क्या है, यदि वाणी के पीछे वक्ता की प्रचण्ड शक्ति न हो? तुम किस भाषा में बोलते हो और किस प्रकार अपनी भाषा में शब्दविन्यास करते हो - इससे किसीको क्या मतलब? तुम अच्छी, लच्छेदार, ओजपूर्ण भाषा का प्रयोग करते हो, या व्याकरण-सम्मत भाषा बोलते हो अथवा तुम्हारी भाषा अलंकारपूर्ण है या नहीं इससे भी किसी का क्या प्रयोजन? प्रश्न तो है - तुम्हारे पास लोगों को देने के लिए कुछ है या नहीं? यहाँ केवल कहानी - किस्से सुनने की बात नहीं है, बात है देने और लेने की। तुम्हारे पास देने के लिए कुछ है? यही पहला और मुख्य प्रश्न हैं। यदि है, तो दो।
कुछ भी करो, अपना पूरा मन, जी और प्राण उसमें लगा दो....
स्वामी विवेकानंद जी की अनेक पुस्तकों से उद्धृत
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